दिल्ली विश्वविद्यालय चुनाव में क्यों हारी ABVP?

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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में चुनाव हुए और वहां एक बार फिर यूनाइटेड लेफ़्ट का लाल परचम लहरा गया.

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने इस हार में भी अपनी जीत देखी. उम्मीद थी कि जेएनयू में मिली हार और जीत तक ना पहुंचने के ज़ख़्मों पर डीयू की चुनावी जीत मरहम लगाएगी.

लेकिन ऐसा हो ना सका. साल 2016 में चार में से तीन सीट पर कब्ज़ा जमाने वाली एबीवीपी दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनावों में दो सीटें ही जीतने में कामयाब रही.

इस चुनाव में सबसे बड़ी ट्रॉफ़ी माना जाने वाला अध्यक्ष पद उसके हाथ से निकल गया.

जीत पर कांग्रेस उत्साहित

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जेएनयू में उसकी जीत के बीच वाम छात्र संगठन आ गए थे तो यहां हैरतअंगेज़ तरीके से कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई उसके आड़े आ गई.

और एनएसयूआई ने अपनी जीत और परिषद की हार का पोस्टमार्टम करने में ज़रा देर नहीं लगाई.

डीयू में ABVP को हरानेवाले रॉकी कौन हैं

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में NSUI की दमदार वापसी

NSUI के नेशनल मीडिया इंचार्ज नीरज मिश्रा ने बीबीसी हिंदी से कहा, ”ये भ्रष्टाचार के खिलाफ, विद्यार्थियों के साथ मार-पीट के साथ-साथ आरएसएस और एबीवीपी के खिलाफ एक बहुत बड़ी जीत है. यह जीत कैम्पेनिंग और सोशल मीडिया के बिना अधूरी थी.”

ज़ाहिर है आजकल हर छोटी-बड़ी जीत को केंद्रीय राजनीति से जोड़ने का चलन है. लेकिन जब हार मिले तो उसे संभालना कुछ मुश्किल हो जाता है.

हार किससे जोड़ी जाए?

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एबीवीपी भी इस हार को डीयू कैम्पस की चारदीवारी तक देखना चाहती है. एबीवीपी के नेशनल मीडिया कंवेनर साकेत बहुगुणा ने कहा कि पिछले साल वो तीन सीट पर जीते थे, इस बार दो सीट पर, ऐसे में इसे हार कैसे कहा जा सकता है.

बहुगुणा ने बीबीसी हिंदी से कहा, ”इस हार के कई कारण हैं. स्थानीय मुद्दे, यूनिवर्सिटी से जुड़े विषय और हमारे ख़िलाफ़ खड़े किए गए डमी उम्मीदवार, सब मिलाकर इस हार के लिए ज़िम्मेदार हैं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसे राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ना चाहिए.”

लेकिन एनएसयूआई की इस जीत को कांग्रेस अपनी वापसी के तौर पर पेश कर रही है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय माकन डूसू चुनावों के नतीजों से उत्साहित हैं और उन्होंने कहा कि ये भाजपा और उसकी नीतियों का ख़ारिज होना है.

मोदी की अस्वीकृति क्यों ना मानें?

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लेकिन असल में ये जीत एनएसयूआई (या कांग्रेस) और हार एबीवीपी (या भाजपा) के लिए क्या मायने रखती है?

दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक अपूर्वानंद ने कहा कि इन दिनों छात्र संघ चुनाव किसी छोटी विधानसभा चुनाव की तरह लड़ा जाता है जिसमें राजनीतिक दल अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा देते हैं.

उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, ”ऐसा नहीं होना चाहिए, लेकिन ऐसा है इसलिए ये नतीजे (एबीवीपी के लिए) बड़ा झटका हैं क्योंकि दावा किया जा रहा था कि ये एक तरह से प्रधानमंत्री पर जनमत है”

अपूर्वानंद ने कहा कि इन चुनावों में मिली जीत को प्रधानमंत्री की स्वीकृति के रूप में देखा जाता तो हार को भी एक तरह से अस्वीकृति माना जाना चाहिए.

पहले ही जीत मान ली थी

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साल 1992 में एबीवीपी से जीतकर डूसू पहुंचे और अब पत्रकार के रूप में काम कर रहे अतुल गंगवार भी इस बात की तस्दीक करते हैं

उन्होंने कहा कि इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में ही देखना चाहिए क्योंकि भाजपा के कई नेताओं के तस्वीर वाले पोस्टर भी लगाए गए थे. ऐसे में इस हार की कुछ ज़िम्मेदारी उन्हें भी लेनी चाहिए.

ये पूछने पर कि बीते कई सालों में छात्र संघ चुनाव किस तरह बदला है, उन्होंने कहा, ”पहले ऐसा नहीं होता था. एबीवीपी और भाजपा अलग-अलग होती थी. वैचारिक समर्थन रहता था, लेकिन बाकी कोई लेना-देना नहीं था.”

अतुल ने कहा, ”एबीवीपी को लग रहा था कि वो ये चुनाव जीती हुई है, इसलिए सभी क्रेडिट लेने में लगे थे, लेकिन ये भूल गए कि नतीजे आने अभी बाकी हैं.”

एनएसयूआई को किससे फ़ायदा हुआ?

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क्या इन नतीजों को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ा जाए या नहीं, क्या ये केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री पर जनमत है या नहीं, इन गंभीर सवालों से अलहदा ज़मीनी स्तर पर ऐसे क्या कारण थे कि एबीवीपी को मुंह की खानी पड़ी.

दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैम्पस में पीएचडी कर रहे रंगनाथन रवि से जब इन नतीजों की वजह पूछी गई तो उन्होंने कहा, ”छात्र असल में एबीवीपी के कामकाज से खुश नहीं थे. इसके अलावा एनएसयूआई की कैम्पनिंग इस बार बढ़िया थी.”

रवि ने एबीवीपी की हार के लिए वायरल वीडियो को भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा, ”सोशल मीडिया पर एबीवीपी के ख़िलाफ़ कई वीडियो वायरल हुए थे और इससे छात्र काफ़ी ख़फ़ा थे.”

लाखों रुपए का चाय-पानी?

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कुछ वक़्त पहले मीडिया में ख़बरें आई थीं कि डूसू को मिलने वाले आवंटन का बड़ा हिस्सा चाय-कॉफ़ी पर खर्च कर दिया गया. इस ख़बर ने भी परिषद को नुकसान पहुंचाया.

मोतीलाल नेहरू कॉलेज के सिद्धार्थ राज ने कहा, ”इस रिपोर्ट ने छात्रों को काफ़ी नाराज़ कर दिया था. इसके अलावा कई लोगों को लगता है कि एबीवीपी हर वक़्त राष्ट्रवाद का रोना रोकर फ़ायदा लेना चाहती है.”

गुरमेहर कौर भी ख़ुश

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एबीवीपी के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया कैम्पेन चलाने वाली गुरमेहर कौर भी नतीजों से काफ़ी खुश हैं.

उन्होंने ट्वीट किया, ”डीयू के हर छात्र को मुबारक़बाद, आप लोगों ने अपनी यूनिवर्सिटी दोबारा जीत ली है. आपने दिखा दिया है कि हिंसा और हुड़दंग स्वीकार नहीं किया जाएगा… एनएसयूआई और राहुल गांधी को इस जीत पर बधाई.”

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Source | BBC

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