नज़रिया: बाली में रोहिंग्या संकट पर बयान देने से क्यों बचा भारत?

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नरेंद्र मोदी और आंग सान सू चीइमेज कॉपीरइट Getty Images

इंडोनेशिया के बाली में हुई एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस में म्यांमार के हालिया रोहिंग्या संकट पर चिंता जताई गई. एक साझा वक्तव्य जारी करके सभी पक्षों से स्थिरता और सुरक्षा की बहाली के लिए अपील की गई और हिंसक तरीक़ों का इस्तेमाल करने से अधिकतम आत्मसंयम रखने की बात कही गई.

इसे म्यांमार सरकार को अंतरराष्ट्रीय मंच से मिली एक नसीहत कहा जा सकता है. लेकिन भारत ने इस सम्मेलन में अपने प्रतिनिधिमंडल के मौजूद होने के बाद भी इस साझा बयान से ख़ुद को अलग रखा है.

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भारत क्यों इस बयान से अलग हुआ और कहीं यह कोई कूटनीतिक जोख़िम तो नहीं है. यही समझने के लिए बीबीसी संवाददाता कुलदीप मिश्र ने बात की म्यांमार में रहे पूर्व राजदूत राकेश सूद से.

आगे पढ़िए, राकेश सूद की राय.

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जब बाली में यह वक्तव्य जारी किया जा रहा था, तब प्रधानमंत्री म्यांमार में थे. इस बात की अहमियत ज़्यादा है कि प्रधानमंत्री म्यांमार में वहां के नेताओं के साथ क्या बातचीत कर रहे हैं और उन्हें क्या संदेश दे रहे हैं.

अगर म्यांमार में उनकी बातचीत और बाली कांफ्रेंस में जारी बयान में ज़रा-सा भी अंतर सामने आता तो यह आलोचना आम हो जाती कि एक तरफ़ भारत म्यांमार में कुछ कह रहा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर म्यांमार के ख़िलाफ़ साझे बयान में हिस्सा ले रहा है.

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रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़ जो कुछ हो रहा है, उसे समझना इतना सहज नहीं है. वहां कुछ कट्टरपंथी तत्व हैं, जिनकी वजह से बांग्लादेश को भी तक़लीफ हो रही है. इस बारे में बहुत कुछ लिखा गया है. ये सिर्फ मानवाधिकार का विषय नहीं है.

म्यांमार से रिश्ते भी रखने हैं

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बाली के साझा बयान से भारत के अलग रहने का ये मतलब नहीं है कि ताज़ा संकट का जो असर आम रोहिंग्या लोगों पर हुआ, भारत को उसके पक्ष में देखा जाएगा.

क्योंकि भारत ने इस साझा वक्तव्य को रोकने या उसमें अड़ंगा डालने की कोशिश नहीं की. उसने आसियान के बाक़ी सदस्य देशों से बात करके इससे अलग रहना ही उचित समझा.

हमें म्यांमार से अपने पड़ोसी देश के तौर पर भी रिश्ते बनाए रखने हैं और आसियान के साथ भी हमारे रिश्ते हैं, जिसका सदस्य म्यांमार भी है.

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लोकसभा सचिवालय ने अपनी प्रेस रिलीज़ में कहा है कि ये साझा वक्तव्य सतत विकास के वैश्विक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था. इसका मतलब ये है कि इस सम्मेलन का बुनियादी एजेंडा मानव अधिकार का नहीं, सतत विकास का था.

आप अपने एजेंडा से हटकर दूसरे मुद्दे ला रहे हैं. कल को आप कह दें कि आप उत्तर कोरिया पर भी एक वक्तव्य देंगे, क्योंकि वह मसला भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने है. उस लिहाज़ से भी भारत का यह कदम जायज़ है. अगर भारत इससे अलग होता है तो ये कोई चिंता का विषय नहीं है.

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Source | BBC

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