MAHA SHIVARATRI – मराठा सरदार ने भगवान शिव से मांगी थी मन्नत, मुगलों को खदेड़ने के बाद किया रूद्धाभिषेक | PATRIKA – Insta India

MAHA SHIVARATRI – मराठा सरदार ने भगवान शिव से मांगी थी मन्नत, मुगलों को खदेड़ने के बाद किया रूद्धाभिषेक | PATRIKA

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कानपुर, शिवरात्र के चलते पूरे देश के शिवमंदिरों को सजाया गया था और यहां भक्त भगवान शिव की अराधना कर रहे हैं। लेकिन इटावा जिले के यमुना नदी के किनारे बीहड़ में एक ऐसा ंमंदिर है, जिसका निर्माण 1780 में मराठा सरदार ने करवाया था। कानपुर के साथ ही आसपास के जिलों में मुगलों का राज था और वह हिन्दु, देवी-देवताओं के धामिक स्थलों को क्षतिग्रस्त कर रहे थे। पानीपत के तीसरे युद्ध में अहमदशाह अब्दाली का साथ यहां के नवाबों में दिया, जिसके चलते उसका सम्राज्य कानपुर जोन के कई जिलों में हो गया। अहमदशाह और नवाबों ने यहां के लोगों का कत्लेआम शुरू कर दिया। तब मराठा सरकार ने भगवान शिव की अराधना की और मुगलों पर जीत के लिए मन्नत मांगी। कई माह चले युद्ध के दौरान मुगल शासक मराठाओं से परास्त हो गए और तब मराठा सरदार ने शिव मंदिर ? का निर्माण कराया। पुजारी ने बताया कि वशिष्ठ मुनि ने सैकड़ों साल पहले मंदिर के अंदर शिवलिंग स्थापित करवाया था। बीहड़ होने के चलते यहां पर फक्कड़ बाबा से लेकर फूलन देवी तक आकर माथा टेकते थे।
वशिष्ठ मुनि ने स्थापित करवाई थी शिवलिंग
शहर के दक्षिणी किनारे स्थित टिक्सी मंदिर जनपद की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर में शामिल है। यहां आसपास जिलों के साथ ही अन्य प्रदेशों से भक्त शिवरात्र और श्रृवण मास के पर्व पर आते हैं। पुजारी ने बताया कि वशिष्ठ मुनि ने सैकड़ों साल पहले मंदिर के अंदर शिवलिंग स्थापित करवाया था। पानीपत के तीसरे युद्ध में अहमदशाह अब्दाली का साथ देने वाले इस क्षेत्र के नवाबों को हराने की मन्नत पूरी होने पर मराठा सरदार सदाशिव भाऊ ने मंदिर का निर्माण कराया गया था। 1780 में निर्माण कार्य पूर्ण हुआ था, तब से यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। मंदिर के पुजारी जनश्रुति के मुताबिक प्राचीन काल में यह क्षेत्र बीहड़ का जंगल था, वशिष्ठ मुनि ने यहां पर वशिष्ठेश्वर महादेव की स्थापना की थी। शिवलिंग धरातल से ऊंचाई पर था, सिद्ध स्थल होने से शिव भक्त यहां आकर पूजा-अर्चना तपस्या करते थे।
रुद्रीय अभिषेक की दी थी सलाह
इस स्थल से करीब 500 मीटर की दूरी पर यमुना नदी के घाट स्थापित हैं। उस दौरान ग्वालियर-भिंड की ओर आवागमन करने वाले नदी में नाव के माध्यम से आवागमन करते थे। मराठा सरदार सदाशिव भाऊ कन्नौज तथा फर्रुखाबाद में नवाबों को खात्मा करने के लिए सेना सहित 1772 में यमुना नदी पर आकर रुका था। उस समय नवाबों का भी मजबूत सैन्य संगठन था। उस समय कुछ श्रद्धालुओं ने मराठा सरदार को इस शिवलिंग पर रुद्रीय अभिषेक करके अपनी विजय सुनिश्चित करने की सलाह दी। मराठा सरदार ने पूजा-अर्चना करके मन्नत मांगकर नवाबों को परास्त कर दिया। तब मराठा सरदार ने मराठा शैली में शिवोलग तक सीढ़ियों सहित मेहराबदार छत का निर्माण कराया। मराठी सरदार खुद मंदिर में ईटे अपने हाथ से लगाई थीं। मराठा सरदार शिवरात्र और श्रृवण मास पर यहां आकर पूजा-अर्चना करता था। 1780 में निर्माण पूर्ण होना इटावा के गजेटियर में दर्ज है।
दुश्मनों के खत्में के लिए मांगी थी मन्नत
दस्यू फूलन देवी का दस मंदिर से खास लगाव रहा। पुजारी बताते हैं कि फूलन अपने माता-पिता के साथ श्रृवण मास के पहले सोमवार को पूजा-अर्चना के लिए आया करती थी। जब उसने बंदूक उठा ली तो भी मंदिर आना नहीं फूली। अपने दुश्मनों के खत्में के लिए फूलन ने भगवान शिव से मन्नत मांगी थी। बेहमई कांड के बाद फूलन जंगल, नदी को पार कर शिवमंदिर पर पहुंची और रात में रूद्धाषिभेक करवाया था। दस वक्त फूलन के साथ दो दर्जन डकैत साथ में थे। फूलन के अलावा चंबल और बहीड़ के कुख्यात डकैत अक्सर मंदिर में आकर पूजा-अर्चना किया करते थे।
ऐसे पड़ा टिक्सी नाम
टिक्सी प्रमुख साहित्यकार डॉक्टर कुश चतुर्वेदी का कहना है कि टिक्सी मंदिर के नाम से पुकारे जाने को लेकर विद्वान एकमत नहीं हैं, किवदंतियों के मुताबिक वशिष्ठेश्वर महादेव शिविंलग खुले में थे। ग्रीष्मकाल में शिवभक्त शिविंलग पर टिकरी यानी तिपाई पर कलश रखकर शिवलिंग पर जल की बूंदे टपकते रहने की व्यवस्था करते हैं। उस समय टिकरी रखी जाने से टिकरी वाले मंदिर के नाम से मंदिर मशहूर हुआ जो अंग्रेजों का दौर आने पर टिकरी से टिक्सी टेंपिल के नाम से मशहूर हुआ। इस मंदिर पर धरातल से सीढ़िया काफी हैं, महाराष्ट्र की लोकभाषा में सीढ़ी को टिक्सी भी कहते हैं इससे टिक्सी मंदिर का नाम पड़ा। बहरहाल दौर के अनुरूप इस मंदिर का नाम बदलता रहा वर्तमान में टीटी मंदिर पुकारा जा रहा है।

Source | PATRIKA