स्मृति शेष : कहानी को नया तेवर दिया डॉ. दूधनाथ ने | LIVEHINDUSTAN – Insta India

स्मृति शेष : कहानी को नया तेवर दिया डॉ. दूधनाथ ने | LIVEHINDUSTAN

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प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. दूधनाथ सिंह के निधन पर काशी के साहित्यकारों और लेखकों ने गहरा दु:ख व्यक्त किया है। उनके निधन को हिन्दी साहित्य की अपूरणीय क्षति बताया है। उनके अवदान की चर्चा करते हुए साहित्यकारों ने कहा है कि डॉ. दूधनाथ सिंह ने भाषा, शिल्प और कथ्य के क्षेत्र में नए प्रतिमान गढ़े।

बीएचयू भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ला ने कहा कि साठोत्तरी हिन्दी कहानी के अप्रतिम रचनाकार थे डॉ. दूधनाथ सिंह। उनकी भाषा का नुकीलापन पाठकों को पसंद था। वह जितने बड़े कहानीकार थे, उतने ही बड़े आलोचक भी रहे। ‘आखिरी कलाम’ जैसे उपन्यास के इस लेखक की निराला व महादेवी पर लिखित आलोचनात्मक कृतियां हिन्दी साहित्य में अविस्मरणीय रहेंगी।

साहित्यकार डॉ. जितेंद्रनाथ मिश्र ने कहा कि डा. दूधनाथ सिंह ‘नई कहानी’ के यशस्वी हस्ताक्षर हैं। उन्होंने नई कहानी आंदोलन के माध्यम से कथ्य और भाषा को नया तेवर दिया। समाज के अछूते पहलू को कहानी में स्थान दिया। कहानी के माध्यम से सामाजिक न्याय आंदोलन को आगे बढ़ाया।

लेखिका डॉ. नीरजा माधव ने दूधनाथ सिंह को प्रचार से दूर एक मौन साहित्य साधक बताया। उन्होंने कहा है कि उनका निधन एक गंभीर साहित्यचेता का चला जाना है। ‘निराला : आत्महंता आस्था’ जैसी कालजयी कृतियां हमेशा याद रखी जाएंगी।

रचनाकार डॉ. मुक्ता ने कहा है कि दूधनाथ सिंह उन कथाकारों में से थे जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता से समझौता नहीं किया। साहित्यकारों की कई पीढ़ी को एक साथ प्रभावित किया। कहानी को नया तेवर और बुलंद भाषा प्रदान की। उन्होंने जो भाषा शैली गढ़ी, नई पीढ़ी उसका अनुकरण आज भी कर रही है।

यूपी कालेज में हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रामसुधार सिंह के मुताबिक डॉ. दूधनाथ सिंह ने जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष के रूप में साहित्य को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की मुहिम को आगे बढ़ाया।

काशी विद्यापीठ में हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. श्रद्धानंद के मुताबिक वह सिर्फ कथाकार ही नहीं बल्कि उच्चकोटि के समीक्षक भी थे। उनका पूरा जीवन साहित्य में रचा-बसा था। उन्होंने अपने कृतियों के माध्यम से पात्रों और चरित्रों को नई ऊंचाई प्रदान की।

Source | LiveHindustan