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नज़रिया: एक जैसे थे सन् 84 के सिख और गुजरात दंगे लेकिन…

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इंदिरा गांधी की हत्याइमेज कॉपीरइट BEDI/AFP/Getty Images

31 अक्तूबर को इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि थी और 1 नवंबर को उस नरसंहार की जो इंदिरा गांधी की हत्या के बाद शुरू हुआ था.

साल 1984 की 31 अक्तूबर को दिल्ली के कई इलाकों में सिखों के साथ हुई सांप्रदायिक हिंसा की ख़बरें मिली थीं, लेकिन हिंसा के बाद हत्या की पहली ख़बर अगले सवेरे ही दर्ज हुई थी. ये घटना तड़के पश्चिमी दिल्ली में हुई थी.

इंदिरा गांधी की हत्या और हथियारों से लैस भीड़ के सिखों पर हमला करने की घटना और फिर इस हिंसा में 2,733 लोगों की मौत होने के बीच काफ़ी समय था जो सरकार की इस दलील को झूठा ठहराता है कि दंगे हत्या के तुरंत बाद ही शुरू हो गए थे और इनके पीछे किसी की कोई साज़िश नहीं थी.

साल 2002 में गुजरात में भी यही मॉडल दोहराया गया था. गोधरा में हिंसा के बाद दंगे का पहला मामला गुलबर्ग सोसायटी में सामने आया जो साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के डिब्बे के जलाए जाने के क़रीब 30 घंटे बाद हुआ था.

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माया कोडनानी

1984 और 2002 के दंगों के बीच एक बड़ा फर्क ये है कि जिन पर आरोप लगे उनमें से अधिकतर आरोप से मुक्त कर दिए गए. दिल्ली में हुए 1984 के दंगे बड़े पैमाने पर हुए थे और इसमें आधिकारिक तौर पर कुल 2,733 लोगों की मौत हुई थी. लेकिन बीते 33 सालों में ये मामला न्याय पाने की दिशा में कुछ ख़ास आगे नहीं बढ़ पाया. देश की क्रिमिनल न्याय व्यवस्था भी 33 साल पुराने इस मामले में नाकाम दिखती है.

2002 के गुजरात दंगा पीड़ितों की तुलना में 1984 के सिख दंगा पीड़ितों को न्याय के नाम पर दिलासा देने के लिए कम ही वजहें मिली हैं, ख़ास कर उन मामलों में जहां राजनेताओं के नाम शामिल हैं. गुजरात दंगा पीड़ितों के लिए राहत की बात यह है कि इस मामले में वो मोदी सरकार की एक मंत्री माया कोडनानी को दोषी साबित करने में सफल हुए हैं.

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लेकिन देखा जाए तो दिल्ली में हुए दंगों के मामलों में माया कोडनानी के बराबर किसी नेता- सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर, कमलनाथ या एचकेएल भगत के ख़िलाफ़ कथित तौर पर प्रमाण होते हुए भी उन पर अपराध साबित नहीं हो पाया.

दिल्ली दंगों के मामले को देखें तो इस सिलसिले में दर्जनों जांच कमेटियां और कमीशन बनाए गए थे. हाल में दो महीने पहले भी एक कमिटी बनाई गई है, लेकिन इस मामले में किसी को सज़ा नहीं मिलने का ट्रेंड-सा दिखता है.

सुप्रीम कोर्ट ने 1984 दंगों के मामलों में हस्तक्षेप किया है जिसे एक अच्छी पहल के तौर पर देखा जा सकता है. आख़िर 2002 दंगों में अभियुक्त को दोषी करार देने में कोर्ट की भूमिका अहम रही थी. लेकिन ये ‘बहुत देर में बहुत कम मिला’ जैसा मामला साबित हो सकता है.

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बंद फाइलें खोली गईं, फिर बंद हो गईं

सुप्रीम कोर्ट ने सिख दंगों के मामलों की जांच के लिए 16 अगस्त को दो रिटायर्ड जजों की नियुक्ति की है जो इस बात पर अपनी रिपोर्ट देंगे कि बीते दो सालों में स्पेशल जांच दल की स्पष्ट रिपोर्ट के बाद भी 1984 दंगों से जुड़े 200 से अधिक मामले अब तक बंद क्यों हैं. इस पैनल को तीन महीनों के भीतर अपनी रिपोर्ट जमा करनी है.

इस मामले में आंकड़े बहुत कुछ कहते हैं. जिन 293 मामलों की जांच की गई थी उनमें से स्पेशल जांच दल ने 59 मामलों की फ़ाइलों को फिर से जांच के लिए खोला था. फिर से खोले गए इन 59 मामलों में से 38 मामलों की फ़ाइलों को फिर से बंद कर दिया गया और मात्र चार मामलों में चार्जशीट दायर करने के लिए जांच दल सबूत इकट्ठा कर पाई थी.

हालांकि ये दंगे कांग्रेस के शासनकाल में हुए थे, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के शासन के दौरान भी इन दंगों के लिए ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा देने की दिशा में इच्छाशक्ति का अभाव ही दिखता है. जैसे कि 1984 और 2002 के दंगों का समर्थन देने वालों के बीच एक तरह का अनकहा-सा सौदा हो.

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लेकिन इस निराशा के बीच उम्मीद की किरण बन कर आया है दिल्ली हाई कोर्ट जो राजनीतिक रसूख वालों के नाम वाले इस मामले में सुनवाई कर रहा है. कोर्ट फ़िलहाल कांग्रेस के पूर्व मंत्री सज्जन कुमार को आरोपमुक्त करने के ख़िलाफ़ दायर की गई एक अपील की सुनवाई कर रहा है.

दिल्ली के कैन्टोनमेंट एरिया में हिंसा वाली जगह में उनकी उपस्थिति से संबंधित प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही में उनकी तरफ़ उंगली उठाई गई है. इस मामले में अपील पर चल रही कार्यवाही से पीड़ितों में यह उम्मीद जगी है कि वो शायद इस मामले में किसी राजनेता को अपराधी सबित करने में कामयाब होंगे.

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इस मामले की कार्यवाही में शामिल होने के लिए वरिष्ठ वकील एचएस फूल्का ने पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता के अपने पद को छोड़ दिया था. उनका कहना था “1984 दंगा पीड़ितों के लिए न्याय- अभी या कभी नहीं.”

हालांकि पश्चिमी दिल्ली के कैन्टोन्मेंट एरिया में हिंसा से जुड़े मामले में और एक अन्य मामले में उन्हें आरोपों से मुक्त कर दिया गया था, लेकिन किसी अन्य राजनेता की तुलना में सज्जन कुमार के ख़िलाफ़ सांप्रदायिक हिंसा में शामिल होने के अधिक सबूत हैं.

उनसे जुड़े मामले में दंगों में जीवित बचे कई लोगों ने गवाही दी है और कहा है कि सज्जन कुमार ने खुद दंगाई भीड़ का नेतृत्व किया था.

Image caption सज्जन कुमार पर 1984 में सिखों के ख़िलाफ़ दंगे भड़काने का आरोप है

दंगों से उठाए राजनीतिक फ़ायदे

पूर्वी दिल्ली में एचकेएल भगत के चुनावक्षेत्र से भी बड़े पैमाने पर हिंसा होने की ख़बरें आई थीं, लेकिन उनके ख़िलाफ़ हिंसा में सीधी भागीदारी से सबंधित कम ही गवाह हैं. भगत को भी एक मामले में दोषमुक्त कर दिया गया था. साल 2000 में आए इस फ़ैसले की एक बड़ी वजह ये थी कि दंगों के मामलों में कथित तौर पर उनके मौजूद होने के कम गवाह मिले थे.

कांग्रेस के अन्य नेताओं की तरह ही भगत को जस्टिस रंगनाथ मिश्र कमीशन ने दोषमुक्त कर दिया था. 1984 दंगों के बाद राजीव गांधी सरकार ने दंगों की जांच के लिए इस कमीशन का गठन किया था.

1986 में मिश्र कमीशन के भगत को बरी करने का आधार था बलविंदर सिंह नाम के एक सिख नेता की गवाही जो उनके पक्ष में थी. बलविंदर सिंह के बेटे अरविंदर सिंह लवली बाद में शीला दीक्षित सरकार में मंत्री बने थे. विडंबना ये है कि इस साल की शुरूआत में उन्होंने कांग्रेस का दामन छोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया.

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सांप्रदायिक दंगों से उठाए जाने वाले राजनीतिक फ़ायदे देखते हुए ये ज़रूरी है कि क़ानून के लंबे हाथ दंगों को अंजाम देने वाले सेनापतियों को पकड़ें न कि इसमें शामिल रहे छोटे-मोटे लोगों को.

जब तक इस सोच को खत्म नहीं किया जाता कि राजनेताओं को भी सज़ा मिल सकती है, विचारधारा के कारण हो या अवसरवाद के कारण राजनीतिक पार्टियां सांप्रदायिक हिंसा का फ़ायदा लेने से रुकेंगी नहीं.

(मनोज मिट्टा ‘व्हेन अ ट्री शुक डेली: द 1984 कार्नेज एंड इट्स आफ्टरमाथ’ के सह-लेखक और ‘द फ़िक्शन ऑफ़ फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग: मोदी एंड गोधरा’ के लेखक हैं.)

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Source | BBC